शिवलिंग की सच्चाई
शिवलिंग की पूजा हिन्दू धर्म में हर कोई करता है लेकिन बहुत ही अफसोस की बात है की उनमे से यह कोई नहीं जनता की आखिर शिवलिंग है क्या,उसका मतलब क्या है और उसकी पूजा कैसे प्रारम्भ हुई। कोई कहता है की शिवलिंग मतलब होता है शिव का प्रकार क्योकि लिंग मतलब प्रकार भी होता है और कोई कहता है शिवलिंग मतलब शिव का गुप्त अंग क्योकि लिंग मतलब गुप्त अंग भी होता है। इनमे से सही क्या है? आज हम आपको बताएँगे शिवलिंग वास्तविक में है क्या और इसकी पूजा कैसे प्रारम्भ हुई।
शिवलिंग की पूजा कैसे प्रारम्भ हुई?
शिव महापुराण (जिसके प्रकाशक है "खेमराज श्री कृषणदास प्रकाशन मुंबई", हिंदी टीकाकार (अनुवादक) है विद्याविरिधि पंडित ज्वाला प्रसाद जी मिश्र) भाग-1 में विद्वेश्वर संहिता अध्याय 5 पेज 11 पर नंदिकेश्वर यानी शिव के वाहन ने बताया की शिवलिंग की पूजा कैसे प्रारम्भ हुई ?
- विद्यवेश्वर संहिता अध्याय 5 श्लोक 27.30:- पूर्व काल में जो पहला कल्प जो लोक में विख्यात है। उस समय महात्मा ब्रह्मा और विष्णु का परस्पर युद्ध हुआ।(27) उनके मान को दूर करने को उनके बीच में उन निष्कल परमात्मा ने स्तम्भरूप अपना स्वरूप दिखाया।(28) तब जगत के हित की इच्छा से निर्गुण शिव ने उस तेजोमय स्तंभ से अपने लिंग आकार का स्वरूप दिखाया।(29 ) उसी दिन से लोक में वह निष्कल शिव जी का लिंग विख्यात हुआ। (30)
- विद्वेश्वर संहिता पेज 18 अध्याय 9 श्लोक 27 -30 :- इससे मैं अज्ञात स्वरूप हूँ। पीछे तुम्हें दर्शन के निमित साक्षात् ईश्वर तत्क्षणही मैं सगुण रूप हुआ हूँ।(40) मेरे ईश्वर रूप को सकलत्व जानों और यह निष्कल स्तंभ ब्रह्म का बोधक है।(41) लिंग लक्षण होने से यह मेरा लिंग स्वरूप निर्गुण होगा। इस कारण हे पुत्रो! तुम नित्य इसकी अर्चना करना।(42) यह सदा मेरी आत्मा रूप है और मेरी निकटता का कारण है। लिंग और लिंगी के अभेद से यह महत्व नित्य पूजनीय है।(43)
शिवलिंग है सदा शिव का गुप्त अंग
आप ने ऊपर के प्रमाणों से जाना की शिवलिंग की पूजा कैसे प्रारम्भ हुई। अब आपको बताते है की शिव लिंग सदा शिव का गुप्त अंग है और यह बात सिद्ध भी करेंगे ऊपर के ही प्रमाणों के साथ। कुछ बिन्दूए ऊपर दिए गए प्रमाणों से जिनसे से सिद्ध होता है की शिवलिंग सदा शिव का गुप्त अंग है।
- तब जगत के हित की इच्छा से निर्गुण शिव ने उस तेजोमय स्तंभ से अपने लिंग आकार का स्वरूप दिखाया।(29 )
- यह सदा मेरी आत्मा रूप है और मेरी निकटता का कारण है। लिंग और लिंगी के अभेद से यह महत्व नित्य पूजनीय है।(43)
2) अध्याय 9 श्लोक 43 से और भी जायदा स्पष्ट हो गया की शिवलिंग पुरुष गुप्त अंग(लिंग) तथा स्त्री के गुप्त अंग का जोड़ हैं।
परमातमा कबीर जी के शिवलिंग पर विचार
वाणी:- धरै शिव लिंगा बहु विधि रंगा, गाल बजावैं गहले।
जे लिंग पूजें शिव साहिब मिले, तो पूजो क्यों ना खैले।।
शब्दार्थ:- परमेश्वर कबीर जी ने समझाया है कि तत्वज्ञानहीन मूर्ति पूजक अपनी साधना को श्रेष्ठ बताने के लिए गहले यानि ढ़ीठ व्यक्ति गाल बजाते हैं यानि व्यर्थ की बातें बड़बड़ करते हैं जिनका कोई शास्त्रा आधार नहीं होता। वे जनता को भ्रमित करने के लिए विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पत्थर के शिवलिंग रखकर अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं।
कबीर जी ने कहा है कि मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि यदि शिव जी के लिंग को पूजने से शिव जी भगवान का लाभ लेना चाहते हो तो आप धोखे में हैं।
यदि ऐसी बेशर्म साधना करनी है तो खागड़ (व्गत्रडंसम ब्वू) के लिंग की पूजा कर लो जिससे गाय को गर्भ होता है। उससे अमृत दूध मिलता है। हल जोतने के लिए बैल व दूध पीने के लिए गाय उत्पन्न होती है जो प्रत्यक्ष लाभ दिखाई देता है। आपको पता है कि खागड़ के लिंग से कितना लाभ मिलता है। फिर भी उसकी पूजा नहीं कर सकते क्योंकि यह बेशर्मी का कार्य है।
देखे वीडियो क माधयम से शिवलिंग की सचाई





Real spiritual knowledge
ReplyDeleteSaint rampal ji maharaj has true spiritual knowledge which is verify from geeta,puran,Qur'an, Bible..
ReplyDeleteबहुत बढ़िया
ReplyDelete👍👍
ReplyDeleteबहुत अच्छे
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