Monday, November 12, 2018

Reality Of Dayanand Swarswati

महऋषि दयानन्द की अज्ञानता 


आर्य समाज का संस्थापक "महऋषि " दयानन्द एक ऐसा व्यक्ति था जिसको ना तो वेदो का ज्ञान था और ना ही समाज सुधारक था। आज तक हम इस व्यक्ति के  बारे में इतना झूट सुनते हुए आये है की हमने इसको महऋषि की उपाधि दे दी। आज हम आपको इसकी अज्ञानता और समाज भिगाड़ने के काम दिखाते है जिसके बाद आपको इसकी समझ  पे हस्सी ही नहीं  आएगी बल्कि इतना गुस्सा आएगा की इसकी सत्यार्थ (झूटार्थ ) प्रकाश को बीच चौराहे पे जला के आएंगे। 


महऋषि दयानन्द का वेदो का ज्ञान 


महऋषि दयानन्द के  बारे में सबसे जायदा सुन्ना  जाने वाला झूट है की वह वेदो का बहुत बड़ा ज्ञानी था। 
 असलियत यह है की उसको संस्कृत ही आती थी, वेदो का 'व' भी उससे नहीं आता था। दिखाते  है आपको प्रमाणों क साथ। 

१) दयानन्द का विचार - परमात्मा निराकार है और वह एक देशिये नहीं है। (समुल्लास 7 पष्ठ 154 पर लिखा है परमात्मा निराकार है।)

असलियत - परमात्मा साकार है और एक देशिये है। देखिये वेदो से प्रमाण जिनका अनुवाद भी आर्य समाज के  लोगो ने किया है और सार्वदेशिक आर्यप्रतिनिधी सभा दिल्ली से प्रकाशित है।

  • ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 82 मंत्र 1 
     
 ऊपर के मंत्र में साफ़ साफ़ लिखा है की परमात्मा राजा के सामान्य दर्शनीय है। अब राजा निरकार तो होता नहीं है। 
  • ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 86  मंत्र 26 
ऊपर के मन्त्र में साफ़ लिखा है की परमात्मा अपने रूप  को सरल कर के आता है। अगर परमात्मा निराकार होता तो अपना रूप कैसे सरल करता ? इससे सिद्ध है की दयानन्द को वेदो का ज्ञान नहीं था। 
  • यजुर्वेद अध्याय 4 मंत्र 13 
ऊपर के मन्त्र का अनुवाद तो खुद दयानन्द ने किया हुआ है और इसके अनुवाद से सिद्ध होता है की पमात्मा साकार है। 
  • ऋग्वेद मंडल 9 सूक्त 86 मन्त्र 27 

ऊपर के  अनुवाद में लिखा हुआ है की परमात्मा धु लोक के  तीसरे प्र्स्त  पे विराजमान है। इससे सिद्ध हुआ की परमात्मा एक देशिये है और उसकी शक्ति हर जगह व्यापक है। 

२ ) दयानन्द का  विचार - परमात्मा पाप कर्म नाश नहीं केर सकता। (समुल्लास 7 पष्ठ 155 तथा 163 )

     असलियत - यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्रा 13 में छः बार लिखा है कि परमात्मा दान देने वाले अपने भक्त के घोर पाप को भी नाश कर देता है। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ वेद विरूद्ध ज्ञान युक्त है अर्थात् झूठार्थ प्रकाश है।


महऋषि दयानन्द के स्त्रियों के लिए विचार 

  1. समु. 4 पष्ठ 71 पर लिखा है कि कैरी आँखों वाली लड़की से विवाह मत करो, दांत युक्त लड़की से विवाह करो, किसी का नाम पार्वती, गोदावरी, गोमति आदि नदियों और पर्वतों पर हो उस लड़की से विवाह मत करो।
विचार - अगर इसकी बात सही माने तो भगवान् शिव जी से भी गलती हो गयी की उन्होंने  पारवती जी से विवाह केर लिया। क्या यह दयानन्द को शिव जी से भी जायदा ज्ञान हो गया ?

2. समुल्लास 4 पष्ठ 82 पर लिखा है कि नवजात बच्चे को माता केवल छः दिन दूध पिलाए फिर अपने स्तनों से दूध बन्द करने के लिए कोई पदार्थ लगाए। बच्चे को दूध पिलाने के लिए ऐसी दाई रखो जिसके स्तनों में दूध हो वह उस नवजात बच्चे को अपना दूध पिलाए।
विचार-  विचार करें यदि एक गांव में एक दिन तीन-चार स्त्रिायों को बच्चे उत्पन्न हो जाऐं तो इतनी दाई कहां से उपलब्ध होगी। एक दाई कोई मिल्क प्लांट नहीं है कि सर्व बच्चों को दूध पिला देगी या उसी समय सर्व दाईयाँ भी बच्चों को जन्म दें। फिर दयानन्द के विधान अनुसार वे अपने बच्चों को पालेंगी या अन्य के बच्चों को ?

3. समु. 4 के पष्ठ 96-97 पर महर्षि दयानन्द ने लिखा है कि विधवा स्त्राी का पुनः विवाह इसलिए नहीं करना चाहिए क्योंकि पुनःविवाह से उसका पति व्रता  धर्म नष्ट हो जाएगा। इसलिए नियोग(सेक्स) करें। इस दयानन्द ने नियोग(नियोग)  के  कुछ नियम भी बताये है जिसे आपको पता लगेगा की यह कितनी लड़कियों की इज़्ज़त करता था। 
  • स्त्राी यदि विधवा हो जाए तो उसको चाहिए कि वह किसी अन्य पुरूष से गर्भ धारण करले। वह सन्तान स्त्राी के विवाहित पति की ही मानी जाएगी। उसी का गोत्रा होगा। वीर्य दाता का नहीं। गर्भ धारण (करने के) पश्चात् उस स्त्राी व गैर पुरूष का कोई नाता न रहे बच्चों की परवरिश भी अकेली स्त्राी स्वयं करें। वीर्य दाता बच्चों के पालन में कोई सहयोग न दे। अपने-अपने घर में रहें।

विचार करें:- क्या अकेली स्त्राी बच्चों का पालन कर सकती है ? उसको  कितनी कठनाई का सामना करना पड़ेगा। प्रसव काल मे तीन महीने पहले तथा जब तक बच्चा छोटा रहता है उस सहित कार्य करना कितना कठिन होगा? कौन स्त्राी अपने कलेजे को निकाल कर अर्थात् संतान को पाल-पोष कर अन्य पुरूष को दे सकती है ? भावार्थ है कि अपने द्वारा उत्पन्न सन्तान को तीन वर्ष पालकर कैसे किसी अन्य को थमा देगी ? भावार्थ है कि महर्षि दयानन्द का सत्यार्थ प्रकाश कोरी बकवास  से भरा है। यह सभ्य समाज में पढ़ने योग्य भी नहीं है। 

--> महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश के समु. 4 पष्ठ 102 पर अपने अनुयाईयों की सुहागिन स्त्रिायों को भी आदेश दिया है कि वे भी किसी गैर पुरूष से पशु तुल्य कर्म अर्थात् नियोग करें, लेकिन निम्न परिस्थितियों में:-

  • यदि किसी का पति धन कमाने विदेश गया हो और तीन वर्ष घर न आए तो वह स्त्राी किसी गैर पुरूष से गर्भ धारण करके सन्तान उत्पति करले। वह सन्तान उसके जीवित विवाहित पति की ही मानी जाएगी। (समु. 4 पष्ठ 102 पर)
  • समु. 4 पष्ठ 102 पर ही लिखा है कि यदि किसी का पति मारता पिटता हो तो उस स्त्राी को चाहिए कि वह किसी अन्य पुरूष के पास जाकर गर्भ धारण करले तथा सन्तान उत्पति करले। वह गैर सन्तान भी विवाहित जीवित पति की मानी जाएगी। उसकी सम्पत्ति की भागीदार मानी जाएगी।

  • समु. 4 पष्ठ 96-97 पर लिखा है कि ‘यदि विधवा का पुनः विवाह कर दिया तो उसका पतिव्रत धर्मनष्ट हो जाएगा’ फिर पष्ठ 101 पर लिखा है कि एक स्त्राी ग्यारह पुरूषों तक नियोग अर्थात् पशु तुल्य कर्म कर सकती हैं। 
विचार-  वाह रे ! अमली (नशेड़ी) महर्षि दयानन्द तेरा समाज नाश का नियोग विद्यान। क्या आर्य समाज या अन्य सभ्य समाज उपरोक्त नियमों का पालन कर सकता है। क्या 1875 से 2008 तक 133 वर्षों में किसी आर्य समाजी अर्थात् महर्षि दयानन्द के अनुयाई ने उपरोक्त नियोग नियम का पालन किया है ? उत्तर होगा, नहीं। तो किसलिए ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ जैसे बेहुदे ज्ञान युक्त पुस्तक को सभ्य समाज में विष को अमृत  बता कर बेचा जा रहा है। 

4. समुल्लास 4 पष्ठ 71 पर ही लिखा है कि 24 वर्ष की स्त्राी 48 वर्ष के पुरूष का विवाह करना उत्तम है।

विचार- वाह रे अज्ञानी दयानन्द ! यह तो पिता पुत्राी की आयु के तुल्य अन्तर है, कौन24 वर्ष की लड़की 48 वर्ष के प्रौढ़ से विवाह करना पसंद करेगी ? (भूतो न भविष्यति) ऐसा आज तक हुआ न होगा।

निष्कर्ष:  ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ जैसे बेहुदे ज्ञान युक्त पुस्तक को सभ्य समाजमें विष को अमत बता कर बेचा जा रहा है। इससे धन हानि, बहु-बेटियों की मान हानि तथा मानव समाज का चरित्रा गिरावट आदि-2 हो रहे हैं। सभ्य समाज इस ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ को एक दिन चैराहों पर डाल कर फंूकेगा तथा महर्षि दयानन्द नाम से चल रही संस्थाओं के नाम बदल डालेगा, इस नाम से भी घणा हो जाऐगी। जब मानव को ‘‘सत्यार्थ प्रकाश’’ में लिखे अभ्रद विवरण की जानकारी होगी।


11 comments:

  1. महर्षि दयानंद तो बिल्कुल अज्ञानी थे

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  2. Mahrishi dayanand was condoconsi as a ggreat SPIspirit teacher , reality he was a completely ignorant person.

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  3. Dayanand Saraswati had no knowledge about our holy scriptures

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  4. Maharishi dayanand has no spiritual knowledge..their knowledge is given wrong massage to society..

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  6. कवि: सर्वज्ञ ,वहीं सर्वज्ञ है, कविर देव जय हो प्रभु,,

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